प्रिंस कुमार, अररिया: Araria News अररिया जिले के बौसी थाना क्षेत्र स्थित करेला गांव के एक परिवार के लिए इस बार की खुशियां आंसू बनकर छलकीं, जब उनका बेटा 13 साल के लंबे वनवास के बाद ‘मौत की मंडी’ से जिंदा लौट आया। मुन्ना उर्फ जमशेद, जिसे 12 साल की मासूम उम्र में दलालों ने काम का झांसा देकर म्यांमार (बर्मा) के हाथों बेच दिया था, अब 25 साल की उम्र में अपने घर वापस आ पाया है।
16 लाख में सौदा और म्यांमार का नारकीय जीवन
मुन्ना ने अपनी आपबीती सुनाते हुए बताया कि उसे तीन स्थानीय दलालों- मुर्शीद, फेंकना और दुखन ने बनारस में काम दिलाने के नाम पर फंसाया था। फिर बनारस से गुवाहाटी, नागालैंड और वहां से अंतरराष्ट्रीय सीमा पार कराकर म्यांमार भेज दिया गया। गुलामी की जंजीरें: म्यांमार में एक लोहा गलाने वाली (रॉड बनाने वाली) फैक्ट्री में उसे 16 लाख रुपये में बेच दिया गया था। वहां उसे बताया गया कि जब तक दलालों द्वारा लिए गए पैसे वसूल नहीं होते, उसे छोड़ा नहीं जाएगा।
अमानवीय अत्याचार: मुन्ना के अनुसार, वहां दिन-रात मजदूरी कराई जाती थी। कई बार उसे अनजान इंजेक्शन लगाए जाते और शरीर से खून भी निकाल लिया जाता था। भागने की कोशिश करने पर उसे बेरहमी से पीटा गया, जिससे उसका सिर फट गया और शरीर पर गहरे निशान पड़ गए।
माँ की ममता की जीत: पटना से दिल्ली तक लड़ी लड़ाई
मुन्ना की घर वापसी किसी चमत्कार से कम नहीं है, जिसके पीछे उसकी माँ जरीना का 13 साल का कड़ा संघर्ष है। लंबा कानूनी सफर: जरीना ने साल 2012 में बौसी थाने में केस दर्ज कराया था। वे थककर बैठी नहीं, बल्कि डीजीपी कार्यालय से लेकर पटना और दिल्ली की अदालतों के चक्कर काटती रहीं।
कोर्ट की सख्ती: हाल ही में न्यायालय ने इस मामले में कड़ा रुख अपनाया। कोर्ट ने आरोपियों की जमानत याचिका खारिज करते हुए ‘कुर्की’ का आदेश दिया और 3 महीने के भीतर बच्चे की बरामदगी का अल्टीमेटम दिया।
दबाव में रिहाई: कानूनी फंदा कसते देख दलालों ने दबाव में आकर मुन्ना को म्यांमार से नागालैंड के रास्ते अररिया आरएस स्टेशन पर लाकर छोड़ दिया, जहाँ से पुलिस ने उसे रिकवर किया।
भारत-नेपाल सीमा पर मानव तस्करी का गंभीर खतरा
बाल कल्याण समिति (CWC) अररिया के अध्यक्ष दीपक वर्मा ने इसे एक माँ के धैर्य और संघर्ष की जीत बताया है। उन्होंने चिंता जताते हुए कहा: “भारत-नेपाल सीमा से सटे इलाकों में मानव तस्करी एक गंभीर समस्या है। मुन्ना का मामला यह साबित करता है कि दलाल कितने संगठित और क्रूर हैं। न्यायालय की सख्ती के कारण ही दलालों ने मुन्ना को म्यांमार से लाकर यहाँ छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा।”
अब बस घर की सुकून भरी छाँव
13 साल तक विदेशी धरती पर जुल्म सहने वाला मुन्ना अब अपनी माँ के पास है। वह कहता है, “मैं अपनी माँ का चेहरा देखने के लिए तड़प गया था, मुझे यकीन नहीं था कि कभी वापस आ पाऊंगा।” फिलहाल पुलिस और बाल कल्याण समिति इस तस्करी नेटवर्क के अन्य सुरागों को खंगालने में जुटी है।



