पूर्णियाँ विश्वविद्यालय की लापरवाही से PAT-24/25 का खेल निरस्त, अब नए रेगुलेशन का खेल शुरू, 14 अगस्त तक मांगा PhD सीटों का पूरा हिसाब

पूर्णियाँ : पूर्णियाँ विश्वविद्यालय में पीएचडी के नाम पर वर्षों से चल रहा इंतजार अब एक ऐसे मोड़ पर पहुंच गया है, जहां सबसे बड़ा सवाल परीक्षा से ज्यादा जवाबदेही का है। PAT-2024 और PAT-2025 के लिए विश्वविद्यालय ने आवेदन और शुल्क लिया, लेकिन समय पर परीक्षा नहीं करा सका। इसी बीच बिहार पीएचडी ऑर्डिनेंस/रेगुलेशन 2026 लागू हो गया और पुराने प्रावधानों के तहत चल रही दोनों सत्रों की प्रक्रिया निरस्त हो गई। यानी छात्रों ने आवेदन किया, शुल्क दिया, तैयारी की और महीनों तक परीक्षा का इंतजार किया—लेकिन विश्वविद्यालय की प्रक्रिया आगे बढ़ने से पहले ही पूरी व्यवस्था नए रेगुलेशन में चली गई।

विश्वविद्यालय की देरी का खामियाजा आखिरकार छात्रों को भुगतना पड़ा। PAT-2024 का आवेदन करीब डेढ़ वर्ष पहले और PAT-2025 का आवेदन लगभग छह महीने पहले लिया गया था। उस समय विश्वविद्यालय ने छात्रों से आवेदन शुल्क लिया था। छात्रों को उम्मीद थी कि परीक्षा आयोजित होगी और आगे पीएचडी नामांकन का रास्ता खुलेगा। लेकिन परीक्षा की तारीख आने से पहले ही नियम बदल गए और दोनों सत्रों की प्रक्रिया खत्म हो गई।

सवाल सिर्फ परीक्षा का नहीं, जिम्मेदारी का है

पूर्णियाँ विश्वविद्यालय के छात्रों का कहना है कि यह मामला अब केवल PAT-24 और PAT-25 के अभ्यर्थियों का नहीं रह गया है। सवाल यह है कि जब आवेदन और शुल्क समय पर लिया गया था, तो परीक्षा समय पर कराने की जिम्मेदारी किसकी थी? पदाधिकारियों की चुप्पी और छात्रों के हित में समय रहते प्रभावी पहल नहीं होने से अभ्यर्थियों में नाराजगी स्वाभाविक है। कुलपति स्तर से भी यदि समय रहते छात्रों के हित में ठोस पहल होती तो शायद स्थिति यहां तक नहीं पहुंचती। नियम बदलना विश्वविद्यालय के अधिकार क्षेत्र से बाहर की बात हो सकती है, लेकिन समय पर परीक्षा कराना और छात्रों को अनिश्चितता से बचाना प्रशासनिक जिम्मेदारी जरूर थी।

अब नए रेगुलेशन में खुलेगा पीएचडी सीटों का पिटारा

इधर नए बिहार पीएचडी ऑर्डिनेंस/रेगुलेशन 2026 के तहत विश्वविद्यालय के छात्र कल्याण पदाधिकारी ने लेटर जारी करते हुए सत्र 2024, 2025 और 2026 के लिए विषयवार एवं सुपरवाइजर वार रिक्त सीटों का ब्योरा मांगा है। विभागाध्यक्षों को 14 अगस्त तक यह जानकारी उपलब्ध कराने का निर्देश दिया गया है। नए नियम के तहत जिस शिक्षक की सेवानिवृत्ति में तीन वर्ष या उससे कम समय बचा है, उसे पीएचडी सुपरवाइजर नहीं माना जाएगा। ऐसे में कई विभागों में सुपरवाइजर की उपलब्धता और उसके आधार पर पीएचडी सीटों की संख्या पर असर पड़ना तय है। अब देखने वाली बात यह होगी कि नए रेगुलेशन के तहत पूर्णियाँ विश्वविद्यालय वास्तव में कितनी पीएचडी सीटें जारी करता है और किन-किन विषयों में छात्रों को अवसर मिलता है।

सीमांचल के छात्रों के धैर्य की भी सीमा है

छात्रों एवं छात्र प्रतिनिधियों का कहना है कि पूर्णियाँ विश्वविद्यालय सिर्फ एक संस्था नहीं, बल्कि सीमांचल के हजारों छात्रों के भविष्य से जुड़ा विश्वविद्यालय है। ऐसे में बार-बार होने वाली देरी और प्रशासनिक निर्णयों का सीधा असर छात्रों के भविष्य पर पड़ता है। PAT-24 और PAT-25 के मामले में छात्रों ने जिस तरह आवेदन और शुल्क जमा करने के बाद लंबा इंतजार किया और अंततः दोनों सत्र निरस्त हो गए, वह पूरे मामले की गंभीरता को बताता है।

अब सिर्फ यह कह देने से बात खत्म नहीं होगी कि नया रेगुलेशन आ गया। छात्रों का सवाल है—पुरानी प्रक्रिया में हुई देरी की जिम्मेदारी कौन लेगा?

सीमांचल के छात्र इस पूरे घटनाक्रम को गंभीरता से देख रहे हैं। समय आने पर छात्र इसका जवाब जरूर देंगे और जवाबदेही तय करने की मांग भी मजबूती से उठेगी।अब सबकी निगाहें 14 अगस्त के बाद आने वाले सीटों के आंकड़े पर हैं। नए रेगुलेशन के तहत कितनी सीटें निकलती हैं, कितने शिक्षक सुपरवाइजर के योग्य बचते हैं और पीएचडी नामांकन की आगे की तस्वीर क्या बनती है—यह आने वाला समय बताएगा। PAT-24 और PAT-25 का अध्याय निरस्त हो चुका है, लेकिन छात्रों के सवाल अभी निरस्त नहीं हुए हैं। परीक्षा भले नहीं हुई, अब जवाबदेही की परीक्षा जरूर होनी चाहिए।