माइग्रेशन फॉर्म में हस्ताक्षर एवं मोहर के नाम पर ₹100! मारवाड़ी कॉलेज किशनगंज में शुल्क वसूली पर छात्र नेता का सवाल

मारवाड़ी कॉलेज, किशनगंज में हस्ताक्षर एवं मोहर के नाम पर शुल्क लेने पर छात्र नेता राजा कुमार ने उठाए सवाल; बोले—“राशि नहीं, नियम और जवाबदेही बड़ा मुद्दा”

किशनगंज : मारवाड़ी कॉलेज, किशनगंज में माइग्रेशन फॉर्म पर हस्ताक्षर एवं मोहर के नाम पर छात्र से ₹100 शुल्क लिए जाने का मामला सामने आने के बाद कॉलेज प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल उठने लगे हैं। छात्र की शिकायत के बाद छात्र नेता सह लॉ के छात्र राजा कुमार ने मामले को लेकर कॉलेज के प्राचार्य डॉ. संजीव कुमार से फोन पर बातचीत की। राजा कुमार का दावा है कि बातचीत के दौरान प्राचार्य ने माइग्रेशन फॉर्म पर हस्ताक्षर के नाम पर ₹100 लिए जाने की बात स्वीकार की।

वहीं, संबंधित छात्र के पास ₹100 शुल्क की रसीद भी उपलब्ध होने की बात कही गई है। राजा कुमार के अनुसार, उनके पास प्राचार्य से हुई बातचीत से संबंधित प्रमाण भी मौजूद हैं। ₹100 किस नियम के तहत? मामले के सामने आने के बाद सबसे अहम सवाल यह है कि माइग्रेशन फॉर्म पर केवल हस्ताक्षर एवं मोहर के लिए ₹100 शुल्क लेने का नियम, आदेश या अधिकृत प्रावधान क्या है? छात्र नेता राजा कुमार ने मांग की कि कॉलेज प्रशासन स्पष्ट करे कि :-

• ₹100 शुल्क किस आदेश के तहत निर्धारित किया गया है?

• क्या इस शुल्क की विश्वविद्यालय या सक्षम प्राधिकारी से अनुमति प्राप्त है?

• यह राशि किस मद में जमा की जाती है?- अब तक कितने छात्रों से यह शुल्क लिया गया है?

• वसूली गई राशि का लेखा-जोखा किस स्तर पर रखा जा रहा है?

“पूर्णिया विश्वविद्यालय और दूसरे कॉलेज भी सीख लें”— राजा कुमार का तंज

राजा कुमार ने व्यंग्यात्मक अंदाज में कहा कि यदि माइग्रेशन फॉर्म पर हस्ताक्षर के लिए शुल्क लेना कॉलेज की आय बढ़ाने और विकास के लिए धन जुटाने का माध्यम है, तो पूर्णिया विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. विवेकानंद सिंह एवं विश्वविद्यालय के अधीन अन्य सरकारी महाविद्यालयों को भी मारवाड़ी कॉलेज से सीख लेनी चाहिए।उन्होंने कहा कि ऐसी व्यवस्था से यदि कॉलेज आर्थिक रूप से मजबूत होते हैं और विकास के लिए धन उपलब्ध होता है, तो विश्वविद्यालय स्तर पर भी इस व्यवस्था को लागू किया जाना चाहिए।हालांकि, उन्होंने स्पष्ट किया कि सवाल ₹100 की राशि का नहीं बल्कि उस राशि की वैधता, नियम, पारदर्शिता और जवाबदेही का है।

“₹100 नहीं, ₹1,000 की रसीद काट दीजिए”—व्यंग्य में छात्र नेता

राजा कुमार ने कहा कि यदि छात्रों से शुल्क लेना ही विकास का आधार माना जा रहा है, तो ₹100 की जगह ₹1,000 की रसीद ही काट दी जाए। उन्होंने कहा कि सीमांचल के छात्र आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद किसी न किसी तरह मेहनत कर अपनी शिक्षा जारी रखते हैं।उन्होंने कहा कि क्षेत्र के अनेक छात्र पढ़ाई के साथ चाय बेचने, छोटे व्यवसाय, मजदूरी अथवा अन्य कार्यों के माध्यम से अपनी पढ़ाई का खर्च जुटाते हैं। ऐसे में प्रत्येक प्रशासनिक कार्य के लिए अतिरिक्त शुल्क छात्रों पर आर्थिक बोझ डालता है।

पुरानी शिकायतों की भी जांच की मांग

राजा कुमार ने आरोप लगाया कि प्राचार्य डॉ. संजीव कुमार के कार्यकाल में शुल्क वसूली को लेकर छात्र समुदाय के बीच पहले से ही शिकायतें और चर्चाएं रही हैं। उन्होंने कहा कि वर्तमान मामले की जांच केवल ₹100 तक सीमित नहीं रहनी चाहिए।उन्होंने मांग की कि पिछले वर्षों में माइग्रेशन, प्रमाण-पत्र, आवेदन, सत्यापन, हस्ताक्षर एवं अन्य प्रशासनिक कार्यों के नाम पर छात्रों से ली गई राशि की भी जांच की जाए और यह सार्वजनिक किया जाए कि किस शुल्क की वसूली किस नियम और आदेश के तहत की गई।

प्रमाण सार्वजनिक करने की तैयारी

राजा कुमार ने कहा कि उनके पास मामले से संबंधित शुल्क रसीद और प्राचार्य से हुई बातचीत के प्रमाण उपलब्ध हैं। उनका कहना है कि इन प्रमाणों के आधार पर विश्वविद्यालय एवं संबंधित अधिकारियों को मामले की निष्पक्ष जांच करनी चाहिए।उन्होंने कहा कि यदि ₹100 शुल्क पूरी तरह नियमसम्मत है तो कॉलेज प्रशासन संबंधित आधिकारिक आदेश/अधिसूचना सार्वजनिक करे। वहीं, यदि शुल्क निर्धारण या वसूली में नियमों का उल्लंघन पाया जाता है तो जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई होनी चाहिए।फिलहाल, माइग्रेशन फॉर्म पर लिए जा रहे ₹100 ने कॉलेज प्रशासन की शुल्क व्यवस्था और पारदर्शिता पर सवाल खड़े कर दिए हैं। अब निगाहें कॉलेज एवं विश्वविद्यालय प्रशासन के जवाब पर हैं कि आखिर यह शुल्क किस नियम के तहत लिया जा रहा है और अब तक छात्रों से वसूली गई राशि का पूरा हिसाब क्या है।