देशों की शक्ति जीवों के नाश के बजाये मानवता और केंद्रित हो

संपादकीय, Editorial: ( नंदकिशोर सिंह  )

आज पूरी पृथ्वी युद्ध की गर्माहट महसूस कर रही है। हर दिशा में संघर्ष, शोर और विनाश का दृश्य है। शक्तिशाली देशों के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री अपने-अपने राष्ट्रहित की परिभाषा गढ़ रहे हैं, और उसी सोच के आधार पर तय हो रहा है कि किस देश को कितनी ताकत दिखानी है, कितने हथियार चलाने हैं और कितनी कीमत चुकानी है—लेकिन यह कीमत कौन चुका रहा है? आम इंसान। चीन का विस्तारवाद, रूस-यूक्रेन युद्ध के चार वर्षों से जारी हमले, अमेरिका की दबंग नीति, भारत-पाकिस्तान के बीच तनाव, पाकिस्तान द्वारा आतंकवाद का सहारा—ये सब आज वैश्विक राजनीति के भयावह चेहरे बन चुके हैं। अमेरिका और ईरान के बीच संभावित युद्ध, इजराइल-हमास संघर्ष, यूरोपीय देशों का भारत की ओर झुकाव—हर जगह शक्ति संतुलन की होड़ है। यहां तक कि यह स्थिति भी सामने आई कि नामीबिया के राष्ट्रपति को अमेरिका द्वारा उठाए जाने जैसी घटनाओं की चर्चा हुई। दुनिया में कहीं भी, कुछ भी हो रहा है—और हर जगह मानवता की हत्या हो रही है।

आज इंसान, जिसे सबसे बुद्धिमान प्राणी कहा जाता है, वही इंसानियत के खिलाफ खड़ा है। इंसानों द्वारा बनाए गए नियमों को तोड़ने की ललक ने मानव समाज को विनाश की ओर धकेल दिया है। युद्धग्रस्त देशों में बमबारी हो रही है, रॉकेट उड़ रहे हैं, ड्रोन हमले हो रहे हैं। सैनिक मारे जा रहे हैं, महिलाएं विधवा हो रही हैं, बच्चे अनाथ हो रहे हैं—लेकिन लड़ने वाले देशों को मरने वालों की चिंता नहीं है। युद्ध केवल इंसानों का विनाश नहीं करता, बल्कि पृथ्वी के समूचे जीवन तंत्र को प्रभावित करता है। पशु-पक्षी मारे जाते हैं, जंगल और पेड़-पौधे नष्ट होते हैं, खेत बंजर हो जाते हैं, पीढ़ियां उजड़ जाती हैं। जिस धरती पर जीवन को फलना-फूलना चाहिए, वही धरती बारूद और जहर से भरती जा रही है। जीवन नष्ट हो रहा है, लेकिन धरती को तो रहना ही है—तो फिर संतुलन क्यों नहीं?

एक ओर विकास के नाम पर रासायनिक और कृत्रिम संसाधनों का अंधाधुंध उपयोग हो रहा है, जिससे इंसानों की जीवन-सीमा छोटी होती जा रही है और प्राकृतिक संसाधन समाप्त होते जा रहे हैं। दूसरी ओर इंसान ही इंसान की हत्या करने में लगा हुआ है। आखिर यह सब क्यों? जो राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री युद्ध का आदेश देते हैं, क्या वे अजर-अमर हैं? क्या उन्हें भी इस धरती से नहीं जाना है? अगर अंततः सबको जाना ही है, तो फिर मानवता की एक रेखा क्यों नहीं खींची जाती? प्रेम, करुणा और इंसानियत का संदेश क्यों नहीं फैलाया जाता?

आज जरूरत है कि दुनिया के सभी देश अंतरराष्ट्रीय कानूनों और वैश्विक नियमों का सम्मान करें। शक्ति प्रदर्शन नहीं, बल्कि मानवता का संरक्षण ही वास्तविक राष्ट्रहित होना चाहिए। यदि यही स्थिति रही, तो आने वाली पीढ़ियों को न केवल युद्ध की कहानियां मिलेंगी, बल्कि रहने योग्य पृथ्वी भी नहीं बचेगी। युद्ध या शांति चाहिए या फिर शक्ति के बदले संवेदना रखने की जरूरत महसूस होनी चाहिए। राजनीति के अस्तित्व उत्थान एवं पतन तक मानवता के मिशाल की भावना चाहिए। क्योंकि अगर इंसान ही नहीं बचेगा, तो सत्ता, सीमा और विजय का अर्थ क्या रह जाएगा?

Share This Article
अंग इंडिया न्यूज़ एक समर्पित डिजिटल न्यूज़ पोर्टल है जो भारत की सांस्कृतिक गहराइयों, सामाजिक मुद्दों और जन-आवाज को निष्पक्षता और संवेदनशीलता के साथ प्रस्तुत करता है। हमारा उद्देश्य है—हर क्षेत्र, हर वर्ग और हर भाषा को प्रतिनिधित्व देना, ताकि खबरें सिर्फ सूचनाएं न रहें, बल्कि बदलाव की प्रेरणा बनें।हम न सिर्फ राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय घटनाओं को कवर करते हैं, बल्कि उन कहानियों को भी उजागर करते हैं जो आमतौर पर मुख्यधारा से दूर रह जाती हैं। अंग इंडिया न्यूज़ का हर लेख, हर रिपोर्ट और हर विश्लेषण एक सोच के साथ लिखा जाता है—"जनता की नज़र से, जनता के लिए।"
- Advertisement -

आपके लिए ख़ास ख़बर

App Icon