हाल ही में एक नई रिसर्च ने इलेक्ट्रिक वाहनों (EVs) से होने वाले प्रदूषण पर सवाल उठाए हैं, जिससे यह चर्चा का विषय बन गया है कि क्या ये वाहन पेट्रोल-डीज़ल गाड़ियों से भी ज्यादा प्रदूषण फैलाते हैं। आमतौर पर इलेक्ट्रिक वाहनों को पर्यावरण के लिए बेहतर और प्रदूषण कम करने वाली तकनीक माना जाता है, लेकिन अब कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि इन वाहनों से होने वाला कुल प्रदूषण पेट्रोल-डीज़ल वाहनों से कहीं ज्यादा हो सकता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि इलेक्ट्रिक वाहनों की बैटरियों का निर्माण, उनका चार्जिंग और डिस्पोजल प्रदूषण का एक नया स्रोत बनता है। बैटरियों के निर्माण में भारी मात्रा में खनिजों की आवश्यकता होती है, जिनका खनन पर्यावरण को नुकसान पहुंचा सकता है। इसके अलावा, बैटरी के रीसायकल और डिस्पोजल में भी समस्याएं आती हैं, क्योंकि यह एक जटिल प्रक्रिया है और गलत तरीके से निपटने पर यह और भी नुकसानदेह हो सकती है।

एक अध्ययन में यह भी पाया गया है कि इलेक्ट्रिक वाहनों को चार्ज करने के लिए जिन बिजली संयंत्रों से बिजली उत्पादन होता है, अगर वह संयंत्र कोयले या अन्य प्रदूषण फैलाने वाली स्रोतों से चलते हैं, तो इससे कार्बन उत्सर्जन में इज़ाफा हो सकता है। ऐसे में, इलेक्ट्रिक वाहनों के पर्यावरणीय लाभों को पूरी तरह से महसूस करने के लिए बिजली उत्पादन के स्रोतों को भी स्वच्छ और हरित ऊर्जा में बदलना आवश्यक है।

हालांकि, यह भी सच है कि इलेक्ट्रिक वाहन पेट्रोल-डीज़ल वाहनों की तुलना में चलाने के दौरान प्रदूषण काफी कम करते हैं। उनके द्वारा उत्सर्जित ग्रीनहाउस गैसों की मात्रा बहुत ही कम होती है, जिससे वायु गुणवत्ता में सुधार हो सकता है।

रिपोर्ट्स का मानना है कि अगर इलेक्ट्रिक वाहनों के बैटरियों के उत्पादन और चार्जिंग प्रक्रिया को पर्यावरण के अनुकूल बनाया जाए, तो ये वाहनों का प्रदूषण कम करने में एक महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकते हैं। सरकारें और कंपनियां इस दिशा में काम कर रही हैं, ताकि इलेक्ट्रिक वाहनों के कुल जीवनकाल में प्रदूषण की मात्रा को कम किया जा सके।

इस मुद्दे पर विशेषज्ञों का मानना है कि इलेक्ट्रिक वाहन, अगर सही तरीके से अपनाए जाएं और उनके चार्जिंग व बैटरी प्रबंधन को सही दिशा में विकसित किया जाए, तो भविष्य में ये पेट्रोल-डीज़ल वाहनों से भी बेहतर विकल्प साबित हो सकते हैं।

By अंग इंडिया न्यूज़

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