पूर्णिया, विमल किशोर: पूर्णिया जिले का अमौर विधानसभा क्षेत्र, जो परिसीमन के बाद किशनगंज लोकसभा में शामिल है, वर्ष 1977 में अस्तित्व में आया था। तब से अब तक 11 विधायक यहां से जीत चुके हैं, लेकिन क्षेत्र की बदहाली और पिछड़ेपन की तस्वीर अब तक नहीं बदली है। महानंदा, कनकई, परमान और बकरा जैसी नदियों से घिरे इस इलाके में हर साल बाढ़ और कटाव से सैकड़ों एकड़ उपजाऊ भूमि नदी में समा जाती है। इससे न केवल फसलें बर्बाद होती हैं, बल्कि लोगों के घर, जमीन और रोज़गार का साधन भी छिन जाता है। बाढ़ और कटाव के कारण बड़े पैमाने पर पलायन होता है, जिससे यहां की आबादी आर्थिक रूप से कमजोर होती जा रही है।
पुल-पुलिया और सड़क जैसी बुनियादी सुविधाओं का अभाव यहां के विकास में सबसे बड़ी बाधा है। खाड़ी घाट और रसेली घाट पर वर्षों से पुल निर्माण अधूरा पड़ा है, जिससे बरसात के मौसम में कई गांवों का संपर्क पूरी तरह कट जाता है और नाव ही एकमात्र सहारा बनती है। स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति भी बेहद दयनीय है — प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में न तो डॉक्टर हैं और न ही पर्याप्त दवाइयां। क्षेत्र की जनता झोला छाप चिकित्सकों पर निर्भर है। शिक्षा के क्षेत्र में भी स्थिति निराशाजनक है। सरकारी कॉलेज की वर्षों पुरानी मांग अब तक अधूरी है, जिसके कारण छात्र उच्च शिक्षा के लिए बाहर नहीं जा पाते। विद्यालयों में शिक्षकों की कमी, बाढ़ से बार-बार पढ़ाई बाधित होना और संसाधनों की कमी ने शिक्षा व्यवस्था को कमजोर बना दिया है।
विधानसभा क्षेत्र की जनता इस बार उम्मीद लगाए बैठी है कि आने वाले चुनाव में कोई ऐसा जनप्रतिनिधि सामने आए जो दशकों पुरानी समस्याओं — बाढ़ और कटाव से स्थायी राहत, पुल और सड़क निर्माण, स्वास्थ्य व शिक्षा की सुदृढ़ व्यवस्था — को प्राथमिकता देकर इस क्षेत्र को विकास की मुख्यधारा में शामिल करे।



