पूर्णिया: बिहार सरकार के बजट पर सांसद पप्पू यादव ने कड़ा प्रहार करते हुए कहा कि इतने बड़े बजट के बावजूद राज्य में स्वास्थ्य और शिक्षा व्यवस्था बदहाल है, जो सरकार की नीयत और नीति दोनों पर सवाल खड़ा करता है। उन्होंने कहा कि यह बजट आम जनता को राहत देने के बजाय केवल ठेकेदारों और कमीशनखोरों को फायदा पहुंचाने के लिए लाया गया है। पप्पू यादव ने मुख्यमंत्री पर निशाना साधते हुए कहा कि उनका ईमान, ज्ञान, समान, विज्ञान और अरमान सिर्फ विज्ञापन और प्रचार तक सीमित है, जबकि ज़मीनी हकीकत में बिहार बदहाली से जूझ रहा है। उन्होंने आरोप लगाया कि पूर्णिया समेत सीमांचल और कोसी क्षेत्र को एनडीए सरकार ने एक बार फिर बजट में पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया, जबकि यहां आबादी के अनुपात में न तो मेडिकल सुविधाएं हैं, न शिक्षा, न रोजगार और न ही बेहतर विधि-व्यवस्था।
सांसद ने कहा कि बिहार के सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों की भारी कमी है, जांच की सुविधाएं नहीं हैं और हालात इतने खराब हैं कि गरीबों को इलाज के लिए बाहर जाना पड़ता है। वहीं स्कूलों और कॉलेजों में शिक्षा सिर्फ औपचारिकता बनकर रह गई है। उन्होंने चुनौती देते हुए कहा कि अगर सरकार अपने बजट पर भरोसा करती है तो नेताओं और अधिकारियों को अनिवार्य रूप से सरकारी अस्पतालों में इलाज कराना और अपने बच्चों को सरकारी स्कूलों में पढ़ाना चाहिए। उन्होंने केंद्र और राज्य सरकार दोनों को घेरते हुए कहा कि पूर्णिया में हाईकोर्ट बेंच के मुद्दे पर केंद्र ने जिम्मेदारी राज्य पर डाल दी और राज्य सरकार के बजट में इस पर एक शब्द नहीं है। मखाना बोर्ड को लेकर भी बजट में सिर्फ गोल–मोल बातें हैं। सरकार उद्योग विकास का दावा कर रही है, जबकि आर्थिक सर्वेक्षण रिपोर्ट खुद बता रही है कि पिछले 10 वर्षों में बिहार से 250 से अधिक कारखाने पलायन कर चुके हैं।
पप्पू यादव ने कहा कि औद्योगिक विकास की सच्चाई यह है कि देश के 20 प्रमुख राज्यों में बिहार 15वें स्थान पर है और 43.18 लाख सूक्ष्म उद्योग सिर्फ किसी तरह संघर्ष कर रहे हैं। शिक्षा को बजट में प्राथमिकता देने के सरकारी दावे पर सवाल उठाते हुए उन्होंने कहा कि आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार प्राथमिक स्कूलों में 44 लाख बच्चों का नामांकन घट जाना सरकार की सबसे बड़ी नाकामी है। उन्होंने निष्कर्ष निकालते हुए कहा कि यह बजट विकास का नहीं, बल्कि बिहार की जनता को एक बार फिर झांसा देने का दस्तावेज़ है।



