समर्थ से आवेदन, UMIS से वसूली! विश्वविद्यालय अंतर्गत पूर्णियाँ कॉलेज में नामांकन-रजिस्ट्रेशन शुल्क में अनियमितता पर बवाल, छात्र जदयू ने दी आंदोलन की चेतावनी

अंग इंडिया / संवाददाता / पूर्णियाँ : एक ओर बिहार के राज्यपाल सह कुलाधिपति द्वारा विश्वविद्यालयों में UMIS व्यवस्था को समाप्त करने की बात कही जा रही है, वहीं दूसरी ओर पूर्णियाँ विश्वविद्यालय अंतर्गत आने वाले महाविद्यालयों में स्नातक प्रथम सेमेस्टर (सत्र 2026-30) के नामांकन की प्रक्रिया अब भी UMIS पोर्टल के माध्यम से संचालित की जा रही है।

इसी क्रम में पूर्णिया कॉलेज, पूर्णिया में नामांकन एवं रजिस्ट्रेशन शुल्क में विश्वविद्यालय द्वारा निर्धारित राशि से अधिक शुल्क वसूली का मामला सामने आया है, जिससे छात्रों एवं अभिभावकों में भारी नाराजगी देखी जा रही है।जानकारी के अनुसार, पूर्णियाँ कॉलेज में प्रैक्टिकल विषय के छात्रों से निर्धारित ₹2855 के स्थान पर ₹2916.36, नॉन-प्रैक्टिकल विषय के छात्रों से ₹2255 के स्थान पर ₹2316.36 तथा रजिस्ट्रेशन शुल्क ₹600 के स्थान पर ₹661.36 की वसूली UMIS पोर्टल के माध्यम से की जा रही है। छात्रों का कहना है कि जब विश्वविद्यालय स्वयं तय शुल्क से अधिक राशि नहीं लेने का निर्देश देता है, तो फिर यह अतिरिक्त राशि किस आधार पर ली जा रही है।

इस संबंध में पूर्णिया कॉलेज की प्राचार्य ने कहा कि नामांकन की प्रक्रिया पूरी होने के बाद संबंधित विद्यार्थी उन्हें आवेदन दें। यदि वेबसाइट या तकनीकी त्रुटि के कारण अतिरिक्त राशि की वसूली हुई होगी, तो राशि वापस कर दी जाएगी। हालांकि छात्र जदयू ने प्राचार्य के इस बयान पर सवाल खड़े करते हुए इसे दायित्व से पल्ला झाड़ने जैसा बताया। छात्र जदयू नेताओं का कहना है कि जब विश्वविद्यालय द्वारा पहले ही अतिरिक्त शुल्क लेने पर रोक संबंधी आदेश जारी किया जा चुका है, तो फिर शुरुआत में ही अतिरिक्त राशि क्यों ली जा रही है। उन्होंने सवाल उठाया कि आखिर अतिरिक्त शुल्क वसूली के पीछे क्या मानसिकता है और हर वर्ष छात्रों को इस प्रकार के आर्थिक बोझ का सामना क्यों करना पड़ता है।

छात्र जदयू का आरोप है कि मामले को लेकर विश्वविद्यालय के संबंधित पदाधिकारियों से संपर्क किया गया, लेकिन किसी ने स्पष्ट जवाब नहीं दिया। एक अधिकारी ने दूसरे अधिकारी से बात करने की बात कहकर जिम्मेदारी टालने का प्रयास किया।इस मामले को लेकर छात्र जदयू पूर्णियाँ ने विश्वविद्यालय प्रशासन के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है।

छात्र जदयू पूर्णियाँ के जिलाध्यक्ष अंकित झा ने कहा कि एक तरफ विश्वविद्यालय निर्धारित शुल्क से अधिक राशि नहीं लेने की बात करता है, वहीं दूसरी ओर विश्वविद्यालय की ही व्यवस्था के तहत छात्रों से अतिरिक्त शुल्क वसूला जाना गंभीर लापरवाही और छात्रों के साथ आर्थिक अन्याय है।उन्होंने कहा कि नामांकन एवं रजिस्ट्रेशन के नाम पर छात्रों से जितनी भी अतिरिक्त राशि ली गई है, उसकी पूरी जानकारी सार्वजनिक की जाए और सभी छात्रों को उनकी अतिरिक्त राशि वापस की जाए। यदि छात्रों के आर्थिक शोषण पर रोक नहीं लगी तो सीमांचल का छात्र समुदाय अब चुप नहीं बैठेगा और विश्वविद्यालय के हिटलरशाही रवैये एवं जिम्मेदार पदाधिकारियों की उदासीनता के खिलाफ बड़ा आंदोलन चलाया जाएगा।

वहीं छात्र जदयू पूर्णियाँ के जिला उपाध्यक्ष सह प्रवक्ता किशन भारद्वाज ने कहा कि हर वर्ष की भांति इस वर्ष भी छात्रों से किसी भी माध्यम से अतिरिक्त राशि वसूलने की प्रवृत्ति पूरी तरह गलत है और इसे तत्काल बंद किया जाना चाहिए। उन्होंने सवाल उठाया कि जब स्नातक नामांकन के लिए ऑनलाइन आवेदन समर्थ पोर्टल के माध्यम से लिया जा रहा है और कुलपति समर्थ व्यवस्था की उपलब्धियों का बखान करते हैं, तो फिर नामांकन की अंतिम प्रक्रिया UMIS के माध्यम से क्यों कराई जा रही है। इससे पूरी व्यवस्था की पारदर्शिता और उपयोगिता पर प्रश्नचिह्न खड़ा होता है।

छात्र जदयू नगर अध्यक्ष अमन श्रीवास्तव ने कड़ा रुख अपनाते हुए कहा कि विश्वविद्यालय प्रशासन छात्रों को कमजोर समझने की भूल न करे। नामांकन और रजिस्ट्रेशन के नाम पर एक-एक रुपये की अतिरिक्त वसूली का हिसाब देना होगा और छात्रों से ली गई पूरी अतिरिक्त राशि वापस करनी होगी।उन्होंने चेतावनी दी कि यदि विश्वविद्यालय प्रशासन जल्द कार्रवाई नहीं करता है, तो छात्र जदयू सड़क से लेकर विश्वविद्यालय परिसर तक आंदोलन करेगा। साथ ही अतिरिक्त शुल्क की वसूली बंद नहीं होने, पहले से ली गई राशि वापस नहीं करने और पूरे मामले की जवाबदेही तय नहीं होने पर छात्र जदयू कुलपति समेत पूरे विश्वविद्यालय प्रशासन का घेराव कर उग्र आंदोलन करने को बाध्य होगा।

अब बड़ा सवाल यह है कि जब विश्वविद्यालय द्वारा शुल्क की राशि पहले से निर्धारित है और अतिरिक्त शुल्क नहीं लेने की बात कही जाती है, तो UMIS पोर्टल के माध्यम से ली जा रही अतिरिक्त राशि की जिम्मेदारी आखिर किसकी है। इस सवाल का जवाब अब विश्वविद्यालय प्रशासन को देना होगा, जिस पर हजारों छात्र और अभिभावकों की निगाहें टिकी हुई हैं।