पूर्णियाँ : पूर्णियाँ विश्वविद्यालय परिसर से सटे पीजी पुरुष छात्रावास में बुधवार देर रात उत्पाद विभाग द्वारा की गई छापेमारी के दौरान शोधार्थी एवं युवा राजद नेता संभव कुमार उर्फ अंकुर यादव को कथित रूप से शराब के नशे की हालत में गिरफ्तार किए जाने के बाद मामला अब केवल शराबबंदी कानून तक सीमित नहीं रह गया है। घटना के बाद छात्रावास के संचालन, निगरानी और प्रशासनिक जिम्मेदारी को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। उत्पाद विभाग के अनुसार ब्रेथ एनालाइजर जांच में शराब सेवन की पुष्टि होने के बाद अंकुर यादव के विरुद्ध बिहार मद्य निषेध एवं उत्पाद अधिनियम के तहत कार्रवाई की गई। हालांकि गिरफ्तारी के बाद यह तथ्य सामने आया कि जिस छात्रावास से उन्हें गिरफ्तार किया गया, उसे लंबे समय से जर्जर और परित्यक्त माना जाता रहा है।
इस बीच पूर्णियाँ विश्वविद्यालय प्रशासन ने स्पष्ट किया है कि संबंधित पीजी पुरुष छात्रावास विश्वविद्यालय परिसर के निकट अवश्य स्थित है, लेकिन वह पूर्णियाँ विश्वविद्यालय के अधीन नहीं है। विश्वविद्यालय प्रशासन के अनुसार उक्त छात्रावास का स्वामित्व पूर्णियाँ कॉलेज के अधीन आता है। वहीं पूर्णियाँ कॉलेज प्रशासन का कहना है कि छात्रावास की जर्जर स्थिति को लेकर पूर्व में कई बार संबंधित अधिकारियों और जिला प्रशासन को अवगत कराया जा चुका है। भवन की स्थिति को देखते हुए वर्षों पहले इसे उपयोग के लिए उपयुक्त नहीं माना गया था। घटना के बाद सबसे बड़ा प्रश्न यह उठ रहा है कि यदि छात्रावास परित्यक्त अथवा अनुपयोगी घोषित था, तो उसमें छात्र और शोधार्थी किसकी अनुमति से रह रहे है। क्या वहां रहने वाले लोगों का कोई आधिकारिक रिकॉर्ड उपलब्ध है, भवन के उपयोग पर प्रभावी रोक क्यों नहीं लगाई गई और उसकी नियमित निगरानी किस स्तर पर की जा रही है। इन सवालों के जवाब फिलहाल स्पष्ट नहीं हैं।

शिक्षा जगत और विश्वविद्यालय समुदाय से जुड़े लोगों का मानना है कि यह मामला केवल एक व्यक्ति की गिरफ्तारी भर नहीं है, बल्कि छात्रावास प्रबंधन, सुरक्षा व्यवस्था, संपत्ति संरक्षण और प्रशासनिक जवाबदेही से भी सीधे तौर पर जुड़ा हुआ है। यदि भवन वास्तव में परित्यक्त था, तो उसमें लोगों की मौजूदगी और गतिविधियों की जानकारी संबंधित प्रशासनिक इकाइयों को क्यों नहीं थी, इसकी भी जांच आवश्यक है। अब निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि परित्यक्त छात्रावास में लोगों के रहने की परिस्थितियों, निगरानी व्यवस्था में हुई संभावित चूक तथा संबंधित अधिकारियों की जिम्मेदारी को लेकर कोई विभागीय या प्रशासनिक जांच शुरू की जाती है या नहीं। इस पूरे घटनाक्रम ने विश्वविद्यालय और कॉलेज प्रशासन की कार्यप्रणाली पर कई अहम सवाल खड़े कर दिए हैं, जिनके जवाब की अपेक्षा छात्र समुदाय और आम लोग दोनों कर रहे हैं।
