पूर्णिया विश्वविद्यालय, पूर्णिया में अंकपत्र पर संग्राम : दावे और हकीकत आमने-सामने

पूर्णिया : पूर्णिया विश्वविद्यालय में अंकपत्र वितरण को लेकर गंभीर विवाद सामने आया है। 16 अप्रैल 2026 को प्रिंट मीडिया में प्रकाशित एक बयान में विश्वविद्यालय के परीक्षा नियंत्रक डॉ. अमरकांत सिंह द्वारा यह दावा किया गया कि विश्वविद्यालय के अंतर्गत सभी पाठ्यक्रमों के अंकपत्र जारी कर दिए गए हैं। इस दावे के बाद छात्रों के बीच भ्रम और असंतोष की स्थिति उत्पन्न हो गई है।

छात्र नेताओं ने इस बयान को वास्तविक स्थिति से भिन्न और छात्रों को दिग्भ्रमित करने वाला बताया है। छात्र नेता राजा कुमार, जो PAT-2023 के छात्र हैं, ने कहा कि परिणाम प्रकाशित हुए कई महीने बीत जाने के बावजूद उन्हें अब तक अंकपत्र प्राप्त नहीं हुआ है। उन्होंने आरोप लगाया कि जब वे अपने साथियों के साथ परीक्षा नियंत्रक से मिलने पहुंचे, तो उन्हें स्पष्ट रूप से कहा गया कि अंकपत्र देना आवश्यक नहीं है।

इसी मुद्दे पर यूजी सत्र (2023–2027) के छात्र नेता रितेश यादव ने भी गंभीर आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि चौथे सेमेस्टर तक की परीक्षाएं सम्पन्न हो चुकी हैं, लेकिन किसी भी सेमेस्टर का अंकपत्र छात्रों को उपलब्ध नहीं कराया गया है। उन्होंने इसे विश्वविद्यालय प्रशासन की गंभीर लापरवाही बताया, जिससे हजारों छात्रों का शैक्षणिक भविष्य प्रभावित हो रहा है।

छात्र नेताओं का कहना है कि विश्वविद्यालय स्तर पर पारदर्शिता का अभाव दिख रहा है। अंकपत्र के अभाव में छात्र न तो अन्य संस्थानों में नामांकन की प्रक्रिया पूरी कर पा रहे हैं और न ही किसी प्रतियोगी या शैक्षणिक कार्य में प्रमाण प्रस्तुत कर पा रहे हैं।

छात्रों ने यह भी उल्लेख किया कि विश्वविद्यालयों में परीक्षा के उपरांत अंकपत्र उपलब्ध कराना एक अनिवार्य प्रशासनिक प्रक्रिया मानी जाती है। इसके बावजूद यदि अंकपत्र जारी नहीं किए जा रहे हैं, तो यह छात्रों के अधिकारों और शैक्षणिक मानकों के प्रतिकूल है।

छात्र नेताओं ने प्रशासन से तीन प्रमुख मांगें रखी हैं—

1. PAT-2023 तथा यूजी सत्र (2023–2027) के सभी छात्रों को अविलंब अंकपत्र उपलब्ध कराया जाए।

2. परीक्षा नियंत्रक के बयान और वास्तविक स्थिति के बीच अंतर की जांच कराई जाए।

3. विश्वविद्यालय प्रशासन पारदर्शिता सुनिश्चित करते हुए स्पष्ट समयसीमा के साथ अंकपत्र वितरण की व्यवस्था करे।

छात्रों ने चेतावनी दी है कि यदि शीघ्र समाधान नहीं हुआ, तो वे आंदोलन के लिए बाध्य होंगे, जिसकी जिम्मेदारी विश्वविद्यालय प्रशासन की होगी।

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